sant muktabai gatha

आदि मध्य ऊर्ध्व मुक्त भक्त हरि – संत मुक्ताबाई अभंग

आदि मध्य ऊर्ध्व मुक्त भक्त हरि – संत मुक्ताबाई अभंग


आदि मध्य ऊर्ध्व मुक्त भक्त हरि ।
सबाह्य अभ्यंतरी हरि एकु ॥ १ ॥
नलगती तीर्थें हरिरूपें मुक्त ।
अवघेंचि सूक्त जपिनिलें ॥ २ ॥
ज्याचेनि नामें मुक्त पैं जडमूढ ।
तरले दगड समुद्रीं देखा ॥ ३ ॥
मुक्ताई हरिनामें सर्वदां पै मुक्त ।
नाहीं आदि अंत उरला आम्हां ॥ ४ ॥


राम कृष्ण हरी आपणास या अभंगाचा अर्थ माहित असेल तर खालील कंमेंट बॉक्स मध्ये कळवा.

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