श्रीकृष्ण व नरसी मेहता

बर्फ़ी, जलेबी – श्रीकृष्ण व नरसी मेहता कविता – २५

बर्फ़ी, जलेबी – श्रीकृष्ण व नरसी मेहता कविता – २५ 


बर्फ़ी, जलेबी और लड्डू, सबको वहां बरता दिये।
जब सोच आया मन में यूं, होता है क्या अब देखिये॥
वह साधु हंुडी दर्शनी, ले द्वारका में जब गये।
कोठी को सांवल साह की, वां ढूंढते हर जा फिरे॥
हम जिनको हैं यां ढूंढते, यां वह नहीं ज़िनहार हैं॥२५॥


राम कृष्ण हरी आपणास या अभंगाचा अर्थ माहित असेल तर खालील कंमेंट बॉक्स मध्ये कळवा.

बर्फ़ी, जलेबी – श्रीकृष्ण व नरसी मेहता कविता – २५ 

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